किस्मत

अगर गन्ने के खेत में एक लोटा पानी लेके
चले गए फसल बोने
साथ में कैमरे वालों की पैनी नज़रें
तो भला हम क्या समझे?
हल्का होने ही गए होंगे सूबेदार जी!

हमने चलना ही सही समझा
क्यों?
सियासत तो गरम है ना साहेब?
बसें, ट्रेनें चल रहीं हैं
आप पूछोगे
का दिक्कत आ गया
जो निकल गए नंगे पांव स्वदेश को?

अब घर पहुंचने की आस में
अगर सांसें रुक गई
तो मन में शिकवा तो नहीं रहेगा
यहां शहर के कसमें, वादे, कटुता
और लाठीचार्च की चोट खाने से अच्छा है
आत्मनिर्भर होना!

ये है मरी बेटी
अरे नहीं नहीं!
आप निश्चिंत रहो, मेरे सपने ये पूरे कर देगी
आप क्यों बटुआ टटोलने लगे?
वो चंद कागज़ के टुकड़े
या शायद आपकी भाषा में ” किस्मत”
ये दोनों हमसे परे हैं
ये महज़ शेख़ी लग रही होगी आपको?
अब भला 700 किलोमीटर की सैर हो
तो ये भूखा, बेहाल दर्जी किससे बड़बड़ाएगा?
इसलिए मन में ही बातचीत पिरो रहा हूं!

मेरे भाई की खबर सुनी आपने?
अब अगर पटरी भी शमशान बन जाए
तो इसमें भी हमारी ही गलती है
देखिए आप हमें हमारे हाल पर
छोड़ भी नहीं रहे
और बेघर भी कर रहे
ये कहा का न्याय है?

खूब भागदौड़ की मैंने भी
बच्ची को मां की याद आ रही थी
और यहां न खाना, न पगार ,नाही छत
सोचा सरकारी खिचड़ी खाकर
गुज़ारा हो जाएगा
पर जल्द ही वो 700 लोगों की लाइन
हिम्मत तोड़ गई
और अब “किस्मत” भी तो नहीं हमारे पास
जो पहला नंबर आ जाए

एक धारणा हमनें गौर किया
करतब ही कह लीजिए “क़िस्मत” वालों के
पाखंड/ मदद जो कह लो
ऐसी मदद जो स्वार्थ ही दर्शाती है
नक़ाब पहन लिया और निकल गए
चेकबुक लेकर
कुछ दो चार गेहूं के दाने
और एक गिलास पानी
देते हुए फोटो खिंचवा ली
बांट दिया खैरात!

खुद्दारी भी कोई चीज होती है साहेब
भला कौन दान देते हुए फोटो खिचवाएगा?
मजबूरी है तो भीख मांग रहे
आपका भी समय आता है
जब यही भिखारी सिंहासन दिलाते हैं
खैर! नीयत कब बदली है..

एक नया शब्द सुना है बाज़ार में
“फिल्टर”
पानी भरने वाली मशीन थी पहले
नक़ाब बनके रह गई है
“डिजिटल मानवता” के युग में
हम तो महज़ लठैत हैं,
बस हमारा खून पसीना चाहिए
आखिर उन कागज़ के टुकड़ों में
बिक जाते हैं न
जान की कीमत भी शायद
उसी आसपास है

आपकी सियासत, तर्क ,वितर्क
आपके वादे, चार दाने और कुछ अनोखे नियम
हमारे लिए ?
या आपके “किस्मत” को ज़िंदा रखने के लिए?

ख़ैर!

धूप बहुत कड़ी है साहब
झुलसती हुई फ़रियाद
सुनने के लिए शुक्रिया
बच्ची के मां की “पुकार” भी अब
तेज़ होने लगी है
“क़िस्मत” ही समझ लो मेरी!


This is all about the plight of migrant population that constitutes almost 60% of the total population in India.

They have been fighting ever since though this digital age has used them up for those petty media stunts..

They’re not going anywhere..they’re the future.

Thank you..

13 thoughts on “किस्मत

  1. so well written – I have never seen your hindi work – this is beautiful

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    1. Yes I’ve written a few but posted here for the first time ..thank you Sir. Your support is boundless❤️❤️

      Liked by 1 person

      1. Lovely. My absolute pleasure

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  2. “They’re not going anywhere..they’re the future.” ❤ thank you for these words

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    1. Hopefully the entire poem was based on this underlying fact so I had to mention in case language barrier!!
      Thank you for the support. You’ve been awesome❤️❤️

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  3. Mashallah, beautifully penned and drawn. Your sketching is beautiful indeed

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    1. Thank you so much for reading..hindi is definitely the purest mode. Means a lot to receive your support 💕💙

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  4. they are our future but they are not considered to be a part of our future, may be its because we consider them as a speck of sand or stone and i think we forgot that a single speck in our eye can shake us totally.

    beautifully penned .

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    1. i’m glad you got the message right. indeed thy’re the forgotten army of our nation..once outta trend nobody bothers to even take a look!!
      keep reading…..

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      1. You always amaze me ❤

        Liked by 1 person

    1. Woww..truly honoured to have received this notification. Can’t thank you enough..thanks for reading!!

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